तेरा-मेरा रिश्ता…..

तेरा-मेरा रिश्ता एक कच्ची डोर सा 

यह डोरें भी ना कच्ची होने की वजह से जितना जल्दी टूट जाती हैं 
उतना ही जल्दी यह उलझ भी जाती हैं 😦
अब देखो ना हम भी तो उलझ गए एक-दूसरे की जिंदगी में ……
तुम्हें लगता हैं कि मेरी जिंदगी में कोई और होगा 
और मेरा भी ख्याल ठीक कुछ ऐसा ही तो हैं 😦
पर दोनों की जिंदगी में सिवाए उस तन्हाई व अकेलेपन के कुछ भी तो नहीं हैं 🙂
खैर यह बात तो अब की हैं पर इससे पहले अपना रिश्ता ऐसा कुछ था –
तुम्हारे अकेलेपन के सफ़र का सहारा या वक़्त काटने का जरिया मैं थी 
और मेरा सफ़र हूह ……………… अक्सर कट जाता था 
कभी अपने साथ चलते पेड़ो को देखकर तो कभी खेतों की पगडंडियों को झांककर 🙂
कभी तुम्हारे हर मर्ज व गम की दवा मैं तो कभी तुम्हारी हर आह का जवाब वाह मैं थी 🙂
तुम्हारी हर बेवकूफी व अनजानी सी गलतियों का हल मैं थी 
और मेरी पागलपन्तियाँ …………शायद तुम्हें समझदार बनाने में ही कहीं खो गयी !!
तुम्हारी हर बुरी आदत का अच्छापन मैं थी 🙂
कहने को तो तुम्हारी जिंदगी या तुम्हारी सांसें मैं थी खैर छोड़ो यह कुछ ज्यादा ही फिल्मी हो गया 
जी लो अपनी जिंदगी पर बताओ मेरे जैसी जिंदादिली कहाँ से लाओगे ;-)!!! ????
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